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Monday, April 22, 2024
पलामू प्रमंडलमहुआडांड़लातेहार

ग्राउंड रिपोर्ट: सरकारी दावों की पोल खोलता लातेहार का तिसिया गांव, बुनियादी सुविधाओं से है महरूम…

गोपी कुमार सिंह/लातेहार

लातेहार : भले ही झारखंड सरकार खुद को आदिवासी हितैषी बताकर उन्हें हर सुविधा मुहैय्या कराने का दम्भ भरती हो, लेकिन जमीनी हक्कीकत इससे बिल्कुल इतर है। दरअसल लातेहार का तिसिया गांव आजादी के कई दशक बीते जाने के बाद भी मूलभूत सुविधाओं से महरूम है। सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य केंद्र, विद्यालय भवन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी इस गांव के ग्रामीणों को मय्यसर नही है।

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आजादी के बाद भी गुलाम

बूढा पहाड़ की तलहटी पर बसा लातेहार ज़िले के महुआडांड़ प्रखंड अंतर्गत अक्सी पंचायत का तिसिया गांव आज़ादी के कई दशक बीत जाने के बाद भी आजाद नही हुआ है। गांव में निवास करने वाले आदिवासी परिवारों को आजादी के कई दशक बीत जाने के बावजूद बुनियादी सुविधाएं भी मुहैय्या नही हो पा रही है।

आदिवासी बहुल गांव है तिसिया

दरअसल तिसिया गांव और उसके अंतर्गत पड़ने वाले छोट-छोटे टोला को मिलाकर गांव की कुल आबादी 700 के करीब है। जहां विलुप्त होती आदिम जनजाति के कोरवा, नगेसिया जनजाति और कुछेक यादव जाति के लोग निवास करते है। मतलब कुल मिलाकर कहे तो तिसिया गांव पूरी तरह आदिवासी बहुल गांव है।

पेयजल की समस्या

वर्तमान सरकार आदिवासी परिवारों को हर सुविधाएं और योजनाओं से लाभान्वित करने का वादा तो करती है। लेकिन अगर तिसिया गांव के ग्रामीणों की परेशानी की बात करे तो यहां परेशानीयों का अंबार लगा हुआ है। तिसिया गांव में सरकारी योजना के नाम पर महज एक सोलर मोटर टँकी ग्रामीणों को मिला हुआ है। मतलब एक सोलर मोटर टँकी के भरोसे पूरा गांव है। अब आप ही अंदाज़ा लगाए की शुरुआत गर्मी ने ही लोगो की हलख सुखानी शुरू कर दी है। तो आने वाले समय मे कितनी भीषण गर्मी पड़ सकती है। ऐसे में एक सोलर मोटर टँकी से 700 ग्रामीणों की प्यास कैसे बुझाई जा सकती है।

स्वास्थ्य सुविधा

जबकि गांव के लोगों ने आजतक गांव में बिजली की रोशनी तलक नही देखी है। इसके आलावा गांव में इलाज के लिए कोई सुविधा नही है। एक गांव के ग्रामीण बीमार पड़ते तो उन्हें इलाज के नाम पर दवा की एक गोली भी नही मिल पाती। हालांकि CRPF कैम्प लगने से दवा तो ग्रामीणों को अब मुहैया हो जा रहा है। लेकिन गंभीर बीमार के इलाज के लिए कई कोश का सफर करना पड़ता है। अगर हालत ज़्यादा गंभीर है तो जान तक जा सकती है। अब जरा तिसिया गांव को समझ लेते है।

पगडंडियां ही सहारा

दरअसल तिसिया गांव लातेहार जिला मुख्यालय से 75 जबकि महुआडांड़ प्रखंड मुख्यालय से 40 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। बूढा पहाड़ की तराई पर बसा तिसिया गांव चारो तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ है। आज से कुछ महीने पहले तक इस गांव में नक्सलियों का कब्जा था। लेकिन सरकार और प्रशासन की कड़ी मशक्कत के बाद तिसिया गांव को नक्सलियों के चंगुल से मुक्त करा लिया गया है। इतना ही नही सुरक्षा बल के जवान यहां कैम्प बनाकर डेरा भी डाले हुए है। लेकिन गांव के ग्रामीण आज भी गांव में मूलभूत सुविधाएं बहाल होने का बाट जोह रहे है। गांव तक पहुचने के लिए पक्की सड़क तक नही है। लिहाज़ा ग्रामीण हर एक छोटे बड़े और रोजमर्रा के जीवन में उपयोग होने खाद्य सामग्री समेत अन्य जरूरी चीजों के लिए पगडंडियों के सहारे 10 किलोमीटर का सफर तय कर बारेसाढ़ पहुचते है। जबकि सरकारी बाबुओं से और प्रखंड मुख्यालय तक पहुचने के लिए 40 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।

बिजली की समस्या

हालांकि ग्रामीणों का मानना है कि गांव में CRPF कैम्प लगने से उनके जीवन मे बदलाव आना शुरू हो गया है।उन्हे उम्मीद है कि आने वाले दिनों में गांव और ग्रामीण दोनो के दिन बहुरेंगे। गांव में न बिजली न सड़क न तो ग्रामीणों के इलाज़ के लिए कोई स्वास्थ्य केंद्र है और न बच्चो को पढ़ने के लिए विद्यालय भवन है। एक विद्यालय भवन गांव में बना तो जरूर था, लेकिन वह भी देखरेख के अभाव में खंडर में तब्दील हो चुका है।मतलब पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है। लिहाज़ा गांव के स्कूली बच्चे बीते 2 साल से कभी पेड़ के नीचे तो कभी अधूरे प्रधानमंत्री आवास में शिक्षा ग्रहण करने को विवश है। हालांकि यहां CRPF कैम्प लगने के बाद कुछ हद तक सुधार हुआ है। चुकी CRPF ने बच्चो को पढ़ने के लिए एक अस्थाई रूप से करकट से तैयार कर एक रूम मुहैया कराया है। लेकिन बच्चो को शौच के लिए खुले में ही जाना पड़ रहा है। विद्यालय भवन नही होने से स्कूली बच्चो के साथ साथ शिक्षक को भी कई तरह की परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है।

स्कूल भवन के अभाव में जमीन पर बैठ कर पढ़ते हैं बच्चे

बात-चीत में स्कूल के शिक्षक ने बताया कि विद्यालय का भवन काफी समय पहले ही ध्वस्त हो चुका है।जिसके बाद से बच्चों को इधर-उधर पढ़ाना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि वह कई बार विभाग से विद्यालय भवन मांग से संबंधित अर्जी लगा चुके है। लेकिन बात महज आश्वाशन तक ही रह गई है। अबतक विद्यालय भवन नही मिला है। लेकिन उन्होंने कहा कि अब एक दो माह के अंदर विद्यालय भवन बनने की उम्मीद है। विद्यालय का भवन नही होंने से आलम ये है कि गांव के कई बच्चे स्कूल न जाकर इधर उधर घूमते हुए आसानी से नजर आ जाते है। अब इसमे लापरवाही उस बच्चे के परिजनों की है या सरकार की इस सवाल का जवाब तो शायद स्कूल भवन बनने के बाद ही मिल सकता है। चुकी बच्चे के स्कूल नही जाने का एक बड़ा कारण गांव में विद्यालय भवन नही होना भी ग्रामीण मानते है।

बहरहाल आखिर कबतक सरकार और प्रशासन की आंख खुलती है और तिसिया गांव की सूरत बदलती है यह देखना दिलचस्प होगा।