सोशल मीडिया : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या बढ़ती बदजुबानी

विशेष आलेख

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सप्प जैसे सोशल साइट्स वैश्विक स्तर पर लोगों को करीब लेकर आई है। राजनेता, खिलाड़ी, कलाकार सहित युवा वर्ग में सोशल मीडिया को लेकर क्रेज है। हर छोटे व बड़े मुद्दों पर अपनी बात या राय जाहिर करने का ये बेहतर मंच साबित हुआ है। जिस तरह से सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है, लोगों के विचार में खुलापन आया है।

सोशल मीडिया पर राजनितिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक मुद्दों पर अक्सर बहस देखी जाती है। मगर वैचारिक अतिवाद की वजह से इसका इश्तेमाल गलत हो रहा है। जिसने अभिव्यक्ति की आजादी में कड़वाहट घोल दी है।

आज के इस तकनीक के दौर में सोशल मीडिया की अहमियत काफी बढ़ गई है। हर मिनट लोगों का ध्यान उस हल्की सी आवाज पर लगी रहती है, जो व्हाट्सप्प, फेसफुक या दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का नोटिफिकेशन देते हैं। यदि गौर करें तो इस नोटिफिकेशन में 100 में 90-95 फिजूल के संदेश होते हैं। गांधी-गोडसे, हिन्दू-मुसलमान या हिंदी-उर्दू।

फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सप्प ग्रुप पर धड़ल्ले से कटुता फैलाई जा रही है। इसमें वैमनष्य बढ़ती है, यही रवैया सोशल मीडिया को असामाजिक बनाता है।

सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है, उनमें से अधिकांश बेवजह के तनाव बढ़ाने वाले होते हैं। जिस तरह की भाषा का इश्तेमाल होता है वह तो और भी निंदनीय है। सोशल मीडिया पर औसतन 100 में 5 जरूरी और जानकारी प्रद पोस्ट होते हैं। वहीं 90 फीसदी या तो फेक होते हैं या बेहद संक्रमित।

जी हाँ ये वो पोस्ट हैं जो जंगल में आग की तरह फैलते है, इनका संक्रमण समाज को कोरोना से भी ज्यादा बुरी तरह प्रभावित करता है। सोशल मीडिया पर अधकचरे राजनितिक ज्ञान और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच जो विचार प्रस्तुत किये जा रहे हैं, वे सभी विद्वेष पर आधारित हैं।

प्रायः कहा जाता है कि बार-बार नकारात्मक बाते की जायं तो स्वाभाविक है वही नकारात्मक चिंतन, समाज को गलत दिशा में ले जाता है। इसलिए सबसे पहले हमें अपनी भूमिका तय करनी होगी, तभी हम समाज और देश के साथ न्याय कर पाएंगे। नहीं तो भविष्य क्या होगा इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

हम यूजर्स को ही अपने लिए लक्षमण रेखा खींचनी होगी, हमें जिम्मेदार होना होगा, फिजूल की नफ़रत भरी पोस्ट को इग्नोर कर हम अपनी जिम्मेदारी निभा सकेंगे।

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